दानवीर राजा महाबली
पौराणिक काल में विरोचन के पुत्र और प्रहलाद के पौत्र महाप्रतापी राजा बलि का शासन था। यद्यपि वे असुर कुल में जन्मे थे, परंतु वे अत्यंत सत्यवादी, पुण्यात्मा, ब्राह्मणभक्त और महादानी थे। उन्होंने अपनी प्रजा का सदैव संतान की भाँति पालन किया। उनके राज्य में कोई भी दुःखी, दरिद्र या भूखा नहीं था। उनकी बढ़ती शक्ति और धार्मिक अनुष्ठानों के बल पर उन्होंने तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
राजा बलि की दानशीलता की कीर्ति ऐसी फैली कि उनके द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। वे जो कुछ भी मांगता, उसे सहर्ष दान कर देते थे।
"सर्वस्वं मया दत्तं तव पादमूले प्रभु।
यदि तृतीयं पदं अवशिष्टं, तर्हि मम मस्तके निधेहि॥"
(हे प्रभु! मैंने अपना सब कुछ आपके चरणों में दे दिया। यदि तीसरा पग शेष है, तो उसे मेरे मस्तक पर रख दीजिए।)
देवराज इंद्र की चिंता और वामन अवतार
राजा बलि का बढ़ता वर्चस्व देखकर देवराज इंद्र और अन्य देवता भयभीत हो गए। उन्हें भय था कि यदि बलि का 100वां यज्ञ पूरा हो गया, तो इंद्र का सिंहासन सदा के लिए छिन जाएगा। देवतागण भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे सहायता की प्रार्थना की। देवताओं के कल्याण और बलि की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने माता अदिति के गर्भ से 'वामन' (बौने ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया।
तीन पग भूमि का दान
भगवान वामन हाथ में छत्र और कमंडल लिए राजा बलि की यज्ञशाला में पहुंचे। बलि ने बटुक ब्राह्मण का सादर स्वागत-सत्कार किया और उनसे कुछ मांगने का आग्रह किया। वामन देव ने केवल तीन पग भूमि की मांग की। राजा बलि के कुलगुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से रोका। किंतु बलि ने अपने वचन पर अडिग रहते हुए दान का संकल्प ले लिया।
संकल्प लेते ही भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण किया। उन्होंने एक पग में पूरी पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग में स्वर्ग लोक और समस्त ब्रह्मांड नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा।
तब राजा बलि ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! संपत्ति से बड़ा संपत्ति का स्वामी होता है। आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।" भगवान वामन ने मुस्कुराते हुए अपना चरण राजा बलि के मस्तक पर रख दिया और उन्हें पाताल लोक (सुतल लोक) भेज दिया।
प्रभु का वरदान
राजा बलि के इस परम दान और निष्काम समर्पण से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को आशीर्वाद दिया कि वे अगले मन्वंतर में इंद्र बनेंगे और जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक बलि का नाम दानशीलता के शिखर पर आदर से लिया जाएगा। यही नहीं, भगवान ने बलि को वरदान दिया कि वे स्वयं सुतल लोक में उनके द्वारपाल बनकर सदा उनकी रक्षा करेंगे।
यह पावन कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का विसर्जन और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति ही सच्ची भक्ति का मार्ग है।